शामों की तेरी अड्डेबाज़ी उस वक़्त मुर्दा इन्सानों जैसे ठहाके लगाती है, जब बोतल तोड़कर निकले हुए जिन को धर दबोचने को तू उमड़ा पड़ता है, और इस-उसके नाम आधी रात तक गन्दे-गन्दे फिकरे कसते हुए, जैसे-तैसे दो-एक रवीन्द्र मारकर, लड़खड़ाते हुए घर लौटता है, उकडूँ होकर उगलने के लिए ! तू क्या कुशल-मंगल है, कलकत्ता ? धत्त् फिजूल की बकवास मत कर ! कुशल-मंगल होता, तो कोई यूँ रुपये-रुपये की रट लगाता ? इतने-इतने गहने गढ़ाता ? अच्छा, अब कभी तुझे फुर्सत होती है, शिशिर के परस के लिए ? इन्द्रधनुष पर निगाह पड़ते ही, सब कुछ छोड़-छाड़कर, क्या तू ठिठक नहीं जाता ? कभी बैठता है कहीं, किसी के करीब ? कभी दु:ख से नज़र मिलाता है ?अच्छा तेरा वह मन क्या, अब बूँदभर भी नहीं बचा ? जेब में फूटी कौड़ी भी न हो, फिर भी खुद को राजा-राजा समझने वाला मन ?
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on Saturday, 20 December 2008
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